The verse and its meaning · Upanishads · Brihadaranyaka · Maitreyi, and Not This, Not This

Why Anything Is Dear

Brihadaranyaka Upanishad 2.4.5

स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रिय ं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि । आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्

Meaning · English

Husband, wife, children, wealth, gods, all things are dear not for their own sake but for the Self. The Self is to be seen, heard, reflected on, meditated on.

Every love on the list, from a spouse to children to money to the gods, is traced back to one source. Things are dear because of the Self, the inner being that does the loving, not for the sake of the things themselves. So the Self is what deserves attention. Four steps follow: see it directly, hear about it, think it through, and dwell on it steadily. When the Self is known this way, the whole world is known along with it.

At night every room in a house glows: the kitchen, the bedroom, the hallway. Follow the wires and they all run back to one meter by the front door. The light seemed to belong to each room, but it came from a single supply. A husband, a child, money, the gods: each is dear by drawing on the Self.

अर्थ · हिन्दी

पति, पत्नी, संतान, धन, देवता, सब कुछ अपने लिए नहीं, बल्कि आत्मा के लिए प्रिय होता है। आत्मा को ही देखना, सुनना, उस पर मनन करना और उसका ध्यान करना चाहिए।

सूची का हर प्रेम, जीवनसाथी से लेकर संतान, धन और देवताओं तक, एक ही स्रोत तक पहुँचता है। वस्तुएँ अपने कारण नहीं, बल्कि आत्मा के कारण प्रिय होती हैं, उस भीतरी सत्ता के कारण जो प्रेम करती है। इसलिए ध्यान देने योग्य आत्मा ही है। इसके बाद चार चरण आते हैं: उसे प्रत्यक्ष देखना, उसके बारे में सुनना, उस पर सोच-विचार करना और उसमें स्थिर भाव से टिके रहना। जब आत्मा को इस तरह जाना जाता है, तो उसके साथ सारा संसार भी जान लिया जाता है।

रात को घर का हर कमरा जगमगाता है: रसोई, शयनकक्ष, गलियारा। तारों के पीछे चलें तो वे सब मुख्य द्वार के पास लगे एक ही मीटर तक लौट आते हैं। रोशनी हर कमरे की अपनी लगती थी, पर वह एक ही स्रोत से आ रही थी। पति, संतान, धन, देवता: हर एक आत्मा से ही अपनी प्रियता पाता है।

In this book

Sacred Sargam

The sacred texts with their meaning, read aloud, with Ask Krishna, a Panchang and bhajans. Free, on the web and as an app. Open Sacred Sargam