The verse and its meaning · Upanishads · Brihadaranyaka · The Light of a Person

Desire, Resolve, Deed

Brihadaranyaka Upanishad 4.4.5

स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयो प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयः । तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति । यथाकारी यथाचारी तथा भवति । साधुकारी साधुर्भवति । पापकारी पापो भवति । पुण्यः पुण्येन कर्मणा पापः पापेन । अथो खल्वाहुः । काममय एवायं पुरुष इति । स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति । यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते । यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते

Meaning · English

This self is Brahman, yet made of all it touches. Good action makes one good, bad action bad. Desire shapes resolve, resolve shapes deed, and the deed one does, one becomes.

The self is Brahman, the whole of what is. Yet in ordinary life it takes on whatever occupies it: thinking, breathing, seeing, the body's earth and water, wanting and not wanting, anger and calm, right and wrong. Then comes the chain. A desire settles into a resolve, a fixed intention. The resolve turns into an action. What a person does, they arrive at. Good and bad are not stamped on anyone in advance. People grow into them, one act at a time.

Picture a bare path worn across a lawn. No one planned it. One person cut the corner, then another, until the grass died and a track appeared that everyone now follows. That is how a person takes shape: a wish leads to a choice, the choice to a step, and enough steps leave a groove the person then walks in.

अर्थ · हिन्दी

यह आत्मा ब्रह्म है, फिर भी जिस-जिसको छूता है उसी से बना है। अच्छे कर्म से मनुष्य अच्छा बनता है, बुरे कर्म से बुरा। इच्छा संकल्प को गढ़ती है, संकल्प कर्म को, और मनुष्य जो कर्म करता है, वही बन जाता है।

आत्मा ब्रह्म है, जो कुछ भी है उसकी पूर्णता। फिर भी साधारण जीवन में वह उसी का रूप ले लेता है जिसमें वह लगा रहता है: सोचना, साँस लेना, देखना, देह की मिट्टी और जल, चाहना और न चाहना, क्रोध और शांति, सही और गलत। फिर शुरू होती है कड़ियों की शृंखला। एक इच्छा ठहरकर संकल्प बन जाती है, एक पक्का निश्चय। संकल्प कर्म में बदल जाता है। मनुष्य जो करता है, वहीं पहुँचता है। अच्छाई और बुराई किसी पर पहले से छापी नहीं जातीं। लोग एक-एक कर्म से उनमें ढलते जाते हैं।

घास के मैदान के आर-पार घिसकर बनी एक सूनी पगडंडी की कल्पना कीजिए। किसी ने उसे सोच-समझकर नहीं बनाया था। एक व्यक्ति कोने से कटकर निकला, फिर दूसरा, यहाँ तक कि घास सूख गई और एक रास्ता उभर आया जिस पर अब सब चलते हैं। मनुष्य भी इसी तरह आकार लेता है: इच्छा से चुनाव होता है, चुनाव से कदम, और बहुत-से कदम एक लीक छोड़ जाते हैं जिस पर फिर वही मनुष्य चलता है।

In this book

Sacred Sargam

The sacred texts with their meaning, read aloud, with Ask Krishna, a Panchang and bhajans. Free, on the web and as an app. Open Sacred Sargam